कला और कलाकार में सुप्रसिद्ध तबला वादक हरिओम माहौर

हरिओम माहौर

कला और कलाकार में संगीत विधा के कलाकार से आपका परिचय कराते हैं| इस अंक में हरिओम माहौर के कला सफ़र पर हम बात करेंगे|

“कला वह स्वतंत्र पक्षी है जिसे उड़ने के लिए पूरा आकाश चाहिए| एक कलाकार रंगों द्वारा कागज़ पर, स्वर ताल द्वारा गीतों से, मिट्टी द्वारा मूर्ति से व शब्दों द्वारा कविताओं से मन के भावों को व्याप्त करता है|”

हरिओम माहौर

हरिओम माहौर, झाँसी के प्रसिद्ध तबला वादक

बुंदेलखंड के झाँसी निवासी हरिओम माहौर एक प्रतिभाशाली तबला वादक हैं| बुंदेलखंड के संगीत जगत में वो किसी परिचय के मोहताज़ नही हैं| इन्होने संगीत की विधिवत शिक्षा ‘संगीत प्रभाकर’ व ‘संगीत प्रवीण’ प्रयाग संगीत समिति इलाहबाद से किया| ‘संगीत विशारद’ भातखंडे संगीत विद्यापीठ लखनऊ से किया|

इसके पश्चात् बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से संगीत में मास्टर डिग्री प्राप्त की| हरिओम जी आगरा के सुप्रसिद्ध पखावज एवं तबला वादक श्री तुलसीदास जी को अपना गुरु मानते हैं| विशेषरूप से अपनी आयु के 10 वर्ष से ही संगीत की इस विधा में आप सक्रिय है|

हरिओम माहौर

हरिओम माहौर की कला की प्रेरणा

हरिओम माहौर के लिए कला एक ईश्वरिये वरदान है| इसके प्रति प्रेरणा को वो ईश्वर का वरदान मानते हैं| बचपन में दुर्घटनावश उनका दायाँ हाथ टूट गया था|टुटा हुआ हाथ आगे से संवेदनहीन हो गया था| किन्तु संगीत के कानों में पड़ते ही, हाथों में अजीब सी थिरकन हुआ करती थी| अब भी हाथ अच्छे से काम नही कर पाता था| तभी मन में आया कि ऐसा वाध यंत्र सिखा जाय जिससे हाथों का संचार निरंतर बना रहे| अतः इन्होंने तबला सीखने का निर्णय लिया| परिणाम स्वरुप इस निर्णय ने हाथ के साथ-साथ भविष्य भी सवांर दिया|

वर्तमान कला परिवेश व कला पर राय

कला के विषय में स्पष्ट विचार रखने वाले हरिओम माहौर कला को स्वतंत्र मानतें हैं| अतः कला में असीम संभावनाएँ हैं| अन्ततः संभावनों के आकाश में कला के पक्षी को स्वत्रन्त्र उड़ना चाहिए| माहौर जी कला के परिवेश को बहुत विस्तृत मानतें हैं| वह कहते हैं कि कला तो हर मानव में विधमान है| वास्तव में उसे पहचानने व निखारने की आवश्यकता है|

किन्तु कला का परिवेश कुछ विशेष कलाकारों या उत्कृष्ठ लोगों तक सिमट गया है| परिणामस्वरुप, अन्य कलाकारों को आगे बड़ने का उचित मध्यम नही मिल पता| अन्ततः इससे प्रतिभाशाली कलाकार एक शहर में ही सिमिट के रह जातें हैं|

हरिओम माहौर

तबला वादन में प्रवीणता

हरिओम की तबला वादक शैली शास्त्रीय शैली है| मुख्य रूप से दो प्रकार की है-एकल तबला वादन तथा संगत तबला वादन| एकल तबला वादन शास्त्रीय संगीत में होता है| जबकि संगत वादन शास्त्रीय संगीत एवं सुगम संगीत दोनों में होता है| सुगम संगीत में गीत, ग़ज़ल, व भजन इत्यादि आते हैं| हरिओम माहौर दिल्ली घराना व बनारस घराना दोनों का प्रतिनिधित्व करने वाले कलाकार हैं|

हरिओम माहौर

उपलब्धियां

देश के कई भागों में हरिओम माहौर अपनी कला की उच्चस्तरीय प्रस्तुतियां दे चुके हैं| झाँसी, उड़ीसा, लखनऊ, आगरा, बनारस, ग्वालियर, भोपाल जैसे शहरों में अपने अपनी संगीत की कई प्रस्तुतियां दी हैं| छोटे-मोटे कार्यक्रमों व अतिथि निमंत्रणों की तो गिनती ही क्या की जाय| वर्तमान समय के बुंदेलखंड में सबसे सक्रीय कलाकार के रूप में इनकी पहचान है|

इनको प्राप्त कुछ विशेष सम्मान या पुरुष्कार इस प्रकार हैं:

  • कला निधि सम्मान 2017-झाँसी में राष्ट्रीय संगीतज्ञ परिवार दिल्ली द्वारा|
  • ग्वालियर में राष्ट्रीय संगीतज्ञ परिवार दिल्ली व रागायन ग्वालियर के सयुक्त तत्वधान उन्मेंहें संगीत कला रत्न सम्मान -2017 दिया गया|
  • झाँसी में राष्ट्रीय संगीतज्ञ परिवार दिल्ली द्वारा द्वितीय अखिल भारतीय संगीत में उन्हें संगीत गौरव सम्मान 2018 दिया गया|
  • संगीत कोजागरी सम्मान– पंडित गोपाल लक्ष्मण गुणे अकादमी आगरा द्वारा प्रदान किया गया|
  • युवा तबला वादक आगरा सम्मान– साहित्य संगीत समानांतर आगरा द्वारा दिया गया|

लेख

मुईन अख्तर

कला लेखक व चित्रकार, झाँसी

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